लघु पत्रिकाओं की चुनौतियाँ


                                                                   

लघु पत्रिकाओं की चुनौतियाँ  

 रामनाथ  शिवेंद्र 


 लघु पत्रिका का नाम आते ही अपने आप स्पष्ट हो जाता है कि लघु  पत्रिका क्या है तथा इसमें क्या होगा। सादा कवर पर अंदर के पन्नों में बहुत ही गंभीर बातें। किसी भी लघु पत्रिका को अपने बारे में सफाई देने की जरूरत नहीं पड़ती थी, कम से कम इतने सचेत तो हम है ही कि पत्रिका को देखते ही अनुमान लगा लेते हैं और सोचने लगते हैं कि इस पत्रिका में लगभग लगभग वही सब बातें होंगी जो मनुष्यता के हिफाजत में होगी तथा उसके पैरवी करती होगी।

लघु पत्रिका का अर्थ लगभग लगभग लघु मानव की समस्याओं परेशानियों तक फैला हुआ है यह सामान्य अर्थ बोध वाला प्रसंग नहीं है, इसका नाम ही केवल लघु है जबकि यह अपने प्रस्तुतीकरण में बहुत ही महान और विशेष है। महान इसलिए है की लघु पत्रिकाएं समय की जरूरतों से संवाद करती है, समय को विश्लेषित करने तथा मनुष्यता के पक्ष में उसकी धारा का निरूपण करती हैं। जमीन की तरफ देखने का काम मानव सभ्यता में जिन पत्रिकाओं ने प्रारंभ कराया उन में लघु पत्रिकाओं का स्थान बहुत ही विशिष्ट है। ऐसे काम अंग्रेजी शासन काल में छोटे-छोटे पंपलेटो एवं बुलेटिन द्वारा किए कराए जाते थे हमें पता है कि उसे जमाने में प्रेस की सुविधा उतनी उपलब्ध नहीं थी जितनी कि आज है। हाथ से लिखे परचो का स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में एक विशेष स्थान है हालांकि हाथ के लिखे परचो के के बारे में शोधात्मक कार्य नहीं किए गए हैं फिर भी पता है कि यह परचे लोहिया जी जयप्रकाश नारायण जी नरेंद्र देव जी ही नहीं गांधी जी भी लिखा करते थे। और अगर भारत के बाहर की बात करें तो रूस का पूरा के पूरा वामपंथी आंदोलन जो  लेनिन के नेतृत्व में चला करता था उसमें इन छोटे-छोटे पर्चों की बहुत बड़ी भूमिका हुआ करती थी ऐसा ही कुछ चीन में माओ के जमाने में हुआ करता था। इन परचो के चरित्र के बारे में एक बात बहुत ही साफ थी कि ये पर्चे सरकारी भ्रष्टाचार वाले कारनामों के भंडाफोड़ करने वाले हुआ करते थे। धीरे-धीरे मानव सभ्यता पर्चा से लघु पत्रिका तक प्रस्थान करती है।

लघु पत्रिका अपने आप में चुनौती है इसकी चुनौतियां कई रूपों में हमारे सामने साफ-साफ दिखाई देती हैं । पहली चुनौती यही कि रंगीन पत्रिकाओं में जनता की तथा जनता से जुड़ी हुई समस्याओं की या समय से टकराने वाली बातों की कोई जगह नहीं होती थी और न हीं उनमें उन रचनाकारों का ध्यान रखा जाता था जिसे नये रचनाकार  देश व समाज के बारे में जगह-जगह से सोचा करते थे और लिखा करते थे । वे चाहते थे कि हम जिन जिन समस्याओं को देख रहे हैं जिनके कारण भारतीय समाज परेशान है न केवल राजनीतिक रूप से वरन आर्थिक रूप से भी हम उनके बारे में लिखें   उन्हें कहीं प्रकाशित करवाये पर ऐसा संभव नहीं हो पा रहा था।  भारतीय समाज की समाज मूलकता वाली समस्याओं के लिए उन रंगीन पत्रिकाओं में स्थान ही नहीं होता था केवल यह था कि उस समय की  पत्रिकाएं सत्ता व्यवस्था से जुड़कर सत्तात्मक हितोपदेश की बातें ही किया करती थी। जिसके वजह से हमारे समाज के विकास के प्रति सक्रिय लोगों मैं गहरा असंतोष था फल स्वरुप उन लोगों द्वारा  जगह जगह से पत्रिकाएं प्रकाशित की जाने लगी। ये पत्रिकाएं पूरी तरह से स्वतंत्र थी , इनका प्रकाशन स्वतंतत्रा था तो इनके विचार भी पूरी तरह से स्वतंत्रता मूलक तथा विचार प्रमुख हुआ करते थे। हमारे देश में एक जमाना था जब सेठाश्रयी  पत्रिकाएं बहुत जोर शोर से प्रकाशित हुआ करती थी और इनकी बिक्री भी बहुत फायदेमंद हुआ करती थी। सेठों को लगने लगा था कि विचार व चिंतन को भी रूपयो के बल पर प्रचारित व प्रसारित किया जा सकता है। पूरी दुनिया में सेठाश्रयी पत्रिकाओं का बोल वाला था और ये पत्रिकाएं सभ्यता के विमर्श को भी सामने ले आने लगी थी। हमारे देश में स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष का एक ऐसा दौर था जहां बहुत सारे बुद्धजीवियों को लगने लगा कि हम जो स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी कर रहे हैं हमारी भागीदारी को अंग्रेज आश्रित या सेठ आश्रित पत्रिकाएं व अखबार ठीक ढंग से या किसी भी तरह से सामने नहीं ला रही हैं जबकि हमारे संघर्ष के विवरणों को जनता के बीच में पहुंचना चाहिए। आखिरकार हम अपनी आजादी की जो मांग कर रहे हैं यह क्यों कर रहे हैं और यह कितना जरूरी है। हमारे पुरखों की इस सोच ने उन्हें अपने ढंग से अखबार या पत्रिका निकालने के लिए मानसिक रूप से उत्प्रेरित किया फल स्वरुप एक समानांतर विचार आंदोलन पत्रिका तथा अखबार के रूप में सामने आने लगा। उसे दौर में भारतेंदु हरिश्चंद्र एक महत्वपूर्ण एवं अनिवार्य प्रस्तुतकर्ता के रूप में हमारे सामने आते हैं वे कवि वचन सुधा हरिश्चंद्र मैगजीन आदि के माध्यम से समय की आवश्यकता के अनुरूप जन जागरण का काम करने लगते हैं। हिंदी प्रदीप ने भी उसे संमय में बहुत ही अच्छा काम किया। गांधी जी हरिजन के माध्यम से तथा अन्य दूसरे प्रकाशनों के माध्यम से आजादी के जागरण का प्रसारण करते रहे बाद की पीढ़ी में डॉक्टर लोहिया जन नामक पत्रिका निकलने लगे। उन्हें लगने लगा था कि आज देश को और हमारे भारतीय समाज को अंग्रेजी सत्ता प्रबंधन  द्वारा कहीं न कहीं से बहकाया जा रहा है उन्हें नहीं बताया जा रहा है की आजादी हमारे लिए कुदरती तौर पर आवश्यक है हमारा देश है तो हमारी हुकूमत भी होनी चाहिए। हमें कोई भी देश गुलामी के जंजीरों में बाधे नहीं रख सकता।

लघु पत्रिका का नाम आते ही  हमें समझ व मान लेना चाहिए कि इनका प्रकाशन अपने आप में ही चुनौती भरा होता है। चुनौतियां भी कई प्रकार की होती है जो लघु पत्रिका के संपादक के सामने प्रकाशन ,वितरण , सामग्री संकलन से प्रारंभ होकर पत्रिका की नियमितता तक फैली होती है । प्रकाशन कैसे होगा धन कहां से आएगा पत्रिका के लिए सामग्री कहां-कहां से आएगी फिर सबसे बड़ा सवाल इसको कहां-कहां वितरित किया जाएगा इस तरह के कई सवाल लघु पत्रिका के संपादक प्रकाशक के सामने होते हैं, ये सवाल जैसे आजादी के पहले आजादी के कुछ सालों  तक या आप यूं कहें कि आज तक भी ज्यों के त्यों वैसे ही बने हुए हैं। इन सवालों के चरित्र आजादी के पहले जैसे थे वैसे ही  हैं आज भी कोई फर्क नहीं पड़ा।  अब तो ऐसा लगने लगा है कि आज के समय में, स्क्रीन कल्चर के जमाने में, लघु पत्रिकाओं की या बड़ी रंगीन पत्रिकाओं की किसी को कोई आवश्यकता नहीं यह सब सारा काम अब टीवी निपटाने लगी है। हमारा आज का समय दृश्य मूलक होते हुए दृश्य बोध तक जा पहुंचा है हम सब कुछ स्क्रीन पर देखना चाहते हैं और स्क्रीन की कलात्मक बोली को सुनना चाहते हैं। हम किसी पत्रिका को नहीं पढ़ना चाहते और न ही हम किसी किताब को ही पढ़ना चाहते आखिर क्यों पढे? सारा कुछ तो स्क्रीन पर है नेट पर है नेट पर देख लेंगे जरूरत पड़ेगी तो। हमारे सामने आज पठनीयता का संकट बहुत खतरनाक ढंग से खड़ा हो चुका है और हम क्रमशः पठनीयता से बहुत दूर होते जा रहे हैं।  इस सच को जितना जल्दी हो सके हम स्वीकार कर ले नहीं तो काफी देर हो जाएगी।

आज भी मेरी स्मृति में है कि हम किस बेसब्री से ज्ञान रंजन की पत्रिका पहल और हैदराबाद से निकलने वाली बद्री विशाल जी की पत्रिका कल्पना  का एक समय में इंतजार किया करते थे। चंद्रबली सिंह जी की पत्रिका कलम का भी बेसब्री से इंतजार करते थे। हमारा यह इंतजार नामवर सिंह की पत्रिका आलोचना भैरव प्रसाद गुप्त जी की पत्रिका समारंभ, रमेश उपाध्याय की पत्रिका कथन, कथा बिम्ब, कथ्य रूप, मणिका मोहनी जी की पत्रिका वैचारिकी संकलन का भी हम बहुत ही आतुरता के साथ प्रतीक्षा किया करते थे । अब ऐसा नहीं है,  ईमेल के रूप में या ई बुक के रूप में  अधिकांश रचनात्मक साहित्य उपलब्ध हैं।

लघु पत्रिकाओं की चुनौतियों की जो बात है वह तो खैर पहले भी थी और आज भी है पर लघु पत्रिकाओं के योगदान को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। हमें निरंतर याद रखना होगा 1960 से लेकर 70 का दौर,  चीनी हमले का दौर , यह ऐसा समय था जिस समय को लघु पत्रिकाओं ने अपनी मुट्ठी में कर लिया था। पूरे देश स्तर पर लघु पत्रिकाओं के विचारों तथा उसकी प्रस्तुतियों को स्वीकार किया जाने लगा था और रंगीन पत्रिकाओं के विचारों को पूरी तरीके से खारिज कर दिया जा रहा  था।  अगर ऐसा ना होता तो उसे दौर में पूरे देश में वामपंथी विचारधारा का फैलाव न हो पता हालांकि वह फैलाव बहुत लंबे समय तक नहीं चल पाया फिर भी काफी हद तक उसका प्रभाव आज भी भारतीय सभ्यता पर काफी गहरे तक पड़ा हुआ है। वामपंथी विचारधारा ने जिस तरीके से समता को स्वतंत्रता को व्यक्ति की संप्रभुता को प्रचारित प्रसारित किया वह आज के समय में कुदरती बन गया है प्राकृतिक बन गया है माना जाने लगा है कि ये सब सारी बातें तो होनी चाहिए। समता समानता स्वतंत्रता की बातें तो पहले भी थी लेकिन इन्हें कैसे लागू कराया जाए? एक सरकार इन्हें कैसे लागू कर सकती है यह रास्ता दिखाए उसे दौर की लघु साहित्यिक पत्रिकाओं ने , वामपंथी विचारधारा के लेखकों ने क्योंकि ऐसे लोग ही विचार मूलक पत्रिकाओं का संपादन व प्रकाशन कर रहे थे साथ ही साथ वितरण भी।

मानव सभ्यता में कुछ विमर्श ऐसे हैं जिनके बारे में यहां उल्लेख करना आवश्यक लग रहा है जैसे यही की दलित विमर्श, नारी विमर्श, उत्पीड़तो व उपेक्षितों का विमर्श। इस बारे में मैं साफ कहना चाहूंगा जितनी जागृति पश्चिम में देखने को मिली उतनी हमारे यहां नहीं थी।  इस बारे में सबसे पहले सोचने व लिखने वालों में, विचारने वालों में लघु पत्रिकाओ के संपादक वे लेखक ही थे। हम अच्छी तरह से जानते हैं राजेंद्र यादव जी ने हंस के माध्यम से इन विमर्शों को जन जन तक फैलाया और लोगों ने लिखा। आगे चलकर यही विमर्श राजनीतिक ही नहीं सामाजिक विमर्श भी बन गए हैं जो आज तक बने हुए हैं और सत्ताधारियों के लिए बहुत ही कष्ट कर जान पड़ते हैं। सामाजिक जागरूकता के बाद अब एक औरत हजार साल पहले वाली औरत की तरह से नहीं सोचती, एक दलित हजार साल पहले वाले दलित की तरह से नहीं सोचता, एक उत्पीड़ित  या उपेक्षित अपने जीवन के लिए किसी से भीख नहीं मांगता वह खुद खड़ा होना चाहता है और आसमान में मुठिया तानना भी चाहता है।

मुझे गर्व है ऐसा कहने में कि इस तरह की जागृति हमारे देश से निकलने वाली लघु पत्रिकाओं ने ही उपजाया है। मुझे कहना ही चाहिए कि बिलासपुर से निकलने वाली पत्रिका पाठ, भोपाल से निकलने वाली पत्रिका प्रेरणा, बनारस से निकलने वाली पत्रिका आर्य कल्प, मध्य प्रदेश से ही सर्वनाम, उत्तर प्रदेश से असुविधा, महेंद्रगढ़ से निकलने वाली पत्रिका संकेत कुछ ऐसी पत्रिकाएं हैं जो जागरण की दिशा में अच्छा प्रयास कर रही है। लखनऊ से निकलने वाली पत्रिका कथा क्रम को भी हमें लघु पत्रिका ही मानकर चलना चाहिए उसके संपादक शैलेन्द्र सागर जी लगातार इसका प्रकाशन कर रहे हैं और नवागंतुकों को प्रोत्साहित कर रहे हैं।



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